मल्हार नामक एक ब्राह्मण युवा था जो बहुत गरीब था सूखी लकड़ियों जंगल से भींकर वह गांव में बेचता था तब जाकर उसे निर्वाह होता था कुछ दिनों तक बारिश होने के कारण एक दिन उसे बेचने के लिए सुखी लड़कियां नहीं मिली परेशान होकर वह पेड़ के नीचे बैठ गया उसने नजर उठा कर देखा तो उसके सामने बाग आया था
सच्चे मृत्यु को सामने देखकर ब्राह्मण ने सोचा मरना तो है ही क्यों ना बुद्धि से कम लोग कहते ही यदि कोई जानवर को ना छेड़ा तो वह चुपचाप चला जाता है बाघ को देखकर भी उसने अनदेखा कर दिया और गंभीर मुद्रा में अपने पोथी पत्रा लेकर बैठ गया बाघ ने सोचा मुझे देखकर तो और कोई भी तर-तर करता है लेकिन यह जरा भी निर्भय नहीं हुआ जरूरी ही यह युवा कोई विशेष योग्य है तभी मुझे देखकर यह तबीयत नहीं हुआ है उधर मल्हार को डर के मारे बुरा हाल था तब भाग उसे पास जाकर के बोल ब्रह्म देव आप यहां क्या कर रहे हो

आप जान आयु से मैंने आपको पहचान लिया ब्राह्मण दिल थाम कर बोला है मां वनराज आपको प्रणाम में आपके कुलगुरु हूं हमारे पिता दादा परदादा सभी आपके कुल गुरु रहे हैं पर पुत्री में देख रहा हूं कि आपका कल में से किसी ने भी दीक्षा नहीं दी है इसी कारण सभी नरक में दुख भोग रहे हैं यह जानकर बाग को बहुत दुख हुआ वह भीगे हुए स्वर में बोला आप कोई उपाय बताओ कि उन्हें कैसे नरक से मुक्ति मिलेगी मल्हार घबराकर बोला दक्षिणा दे दो सबको मुक्ति मिल जाएगी बाग बोला मैं सुबह-सुबह यहां बरगद के नीचे पेड़ के बैठा हुआ हूं आप ले लेना प्राण इस तरह वह तेजी से कठिन झोपड़ी में घुमा हुआ
एक रात लेटे-लेटे मल्हार को बाग की आखिरी शब्द याद आई मैं दक्षिण बरगद के पेड़ के नीचे रख जाऊंगा आप ले लेना उसने सोचा चल कर देख लेना ही फर्जी ही क्या इस विचार में आते ही वह सो ना सका और सुबह-सुबह उसे घने जंगल में जा पहुंचा काफी ढूंढने के बाद उसे बरगद के कोटा में चमक दिखाई डेरी हरि चांदी व सोने के गने से कोटा भरा पड़ा था उसने जल्दी से यह गाना उठा लिया
और उसे अपने मन में चल आ गया उसने उसे गुफा का पता लग गया उसे लगा कि बाघ की गुफा में तो वह गिरी और दौलत का ढेर लगा हुआ है जिसने बल ने मारा है एक दिन जब बाल धन्यवाद कहने के लिए उसे मिलने वहां गया तो उसने पहले ही तय किया शिकारी के बैग उसे मरवा दे मरते वक्त बाग बोला धोखेबाज दोस्त से तुमने कहीं अच्छे होते हैं जो हमारा भला करते हैं उसके साथ हमें कभी भी विश्वास घात नहीं करना चाहिए विश्वास घाट से बढ़कर कोई पाप नहीं होता है