Shravan Kumar ki Amar Katha श्रवण कुमार की कहानी

1 . माता-पिता की सेवा का संकल्प

प्राचीन भारत में एक निर्धन लेकिन सत्य संस्कारी ब्राह्मण परिवार में रहता था उसके परिवार में श्रवण कुमार नाम का एक आज्ञाकारी पुत्र पुत्र ने जन्म लिया श्रवण कुमार की माता पिता जन्म से ही नेत्रहीन थे वह अपनी गरीबी को कभी अभिशाप नहीं मानते थे लेकिन अपने आशा है अवस्था में के कारण अक्सर चिंतित रहते थे कि उनके पुत्र अपने जीवन में सुख नहीं भोग पाएगा पर श्रवण कुमार के लिए माता-पिता की सेवा ही जन्म का सबसे बड़ा धर्म था वह सुबह से रात तक अपने माता-पिता की हर आवश्यकताओं को ध्यान रखता था उन्हें भोजन करता सहारा देता घूमने फिरने लेकर ज्यादा अपनी माता-पिता की बातों को सुनता माता-पिता की एक ही इच्छा थी कि वह तीर्थ यात्रा पर पवित्र नदियों का स्नान करें लेकिन उनकी आंखें न होने के कारण वह सब कुछ संभव था लेकिन श्रवण कुमार ने इस इच्छा को भी पूरा कर दिया उसने दो टोकरी में एक मजबूत बस के सहारे एक दोनों टोकरियों को रस्सी में बांधकर के दोनों टोकरियों को वहां कर लेटा दिया और अपने कंधे पर रख दिया

2 . तीर्थ यात्रा और राजा दशरथ की भूल

श्रवण कुमार अपने माता-पिता को कंधे में उठाए गंगा जमुना तीर्थ यात्रा कर रहे थे वह हर स्थान पर उन्हें नदी का जल पिलाते और स्नान करते इस रास्ते की कठिनाइयों को भूख प्यास और थकान उसे कभी विचलित नहीं कर पाई माता-पिता के मुख पर संतोष और शांति देकर वह अपना सारा कष्ट भूल जाते थे एक दिन यात्रा के दौरान सरयू नदी के तट पर रात का समय था और माता-पिता को प्यास लगी थी तभी श्रवण कुमार घड़ा लेकर नदी में जल भरने गए तभी इस समय अयोध्या के राजा दशरथ वहां शिकार खेलने आए हुए थे राजा दशरथ को शब्द बेदी बाहर चलने का ज्ञान था तब उन्होंने झाड़ियां के पीछे पानी के भरने की आवाज सुनाई दी उन्होंने समझा कि लगता है कोई जंगली पशु पानी पी रहा है तभी उन्होंने शब्दभेदी बाण का उपयोग किया और उन्होंने सीधा तीर चला दिया जो जाकर के श्रवण कुमार को लग गया और वह भूमि पर गिर पड़ा दर दर्द सेवक करते हुए अपने उन्होंने राजा को बुलाया और बताया कि वह कोई पशु नहीं बल्कि अपने नेत्रहीन माता-पिता के सेवक पुत्र है यह सुनकर राजा दशरथ अत्यंत व्याकुल हो गए उन्होंने श्रवण कुमार से क्षमा मांगी लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी श्रवण कुमार ने अंतिम सांस लेने के लिए पहले राजा से प्रार्थना की कि वह कि वह उसके माता-पिता के दुख का समाचार स्वयं दें और उन्हें जल पिलाई

3 . श्रॉप पश्चाताप और शिक्षा

राजा दशरथ कुंवर उठाकर श्रवण कुमार के माता-पिता के पास पहुंचे और उन्हें जल पिलाया जब माता-पिता ने अपने पुत्र की आवाज ना सुनी तब उन्हें राजा की सच्चाई पहुंची राजा दशरथ रोते हुए सारी घटना बता दिए सुनते ही माता-पिता शौक उठे उन्होंने अपने प्रिय पुत्र के लिए विलाप किया और राजा दशरथ को कहा जा मैं तुम्हें शराब देता हूं कि जिस तरह मैं अपने पुत्र के विलाप में वियोग में भी जिस तरह मैं अपने पुत्र के वियोग और विलाप में मृत्यु को प्राप्त हुआ हूं उसी प्रकार तू भी अपने पुत्र के वियोग या विलाप में मृत्यु को प्राप्त होगा इतना कहकर श्रवण कुमार के पिता की मृत्यु हो गई कुछ ही देर बाद उनकी माता की भी मृत्यु हो गई

श्रवण कुमार की कथा हमें यह सिखाती है की माता-पिता की सेवा सबसे बड़ा धर्म है शक्ति यह भक्ति है और त्याग है कर्तव्य परायण है हमें अपने माता-पिता की हर एक बात माननी चाहिए और उनका आदर करना चाहिए और उनकी हर एक बात को माननी चाहिए आज के समय में हम श्रवण कुमार के जैसे तू नहीं बन सकते पर हम उनकी बातों का पालन तो कर ही सकते हैं

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